Sunday, 29 January 2017

गर्भस्थ शिशु चेतना प्रयोग

जय सदगुरुदेव ,


वर्तमान समय मे इस मंत्र और इस क्रिया की अति आवश्यकता है, क्योंकि हमारी आने वाली पीढ़ी की दिशा ही बदल गयी..... जाने किस दिशा की ओर बढ़ रही है युवा पीढ़ी------- ? 
प्रतिदन न्यूज़ मे, पेपर मे दुर्घटनाएं पढ पढकर यही लगता है की समाज जितनी तरक्की साइंस मे कर रहा हैउतना ही संस्कारों मे पिछड़ता जा रहा है....... शायद इस बात को ही ध्यान मे रखकर गुरुदेव ने इन मंत्रो को ब्रम्हांड से एकत्रित कर शिष्यों को प्रदान किया जिससे कि आने वाली पीढ़ी को इस तरह ही शिक्षित किया जा सके........
भाइयों-बहनों मै चेतानामंत्र के प्रभाव् को प्रत्यक्ष देख चुकी हूं, अपने घर मे नहीं अपितु और भी मेरी कई बहनें है जो अपने बच्चों को देखा कर कृतज्ञ हैं गुरुदेव के प्रति.......
ये सब जानते हैं कि प्रत्येक स्त्री तब ही पूर्णता पाती है जब उसे माँ बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है. मैएने शिविरों और गुरुदेव जी इन मंत्रो कि विशेसता सुनी थी,किन्तु मेरा दुर्भाग्य कि जब मुझे ये दीक्षा और मन्त्र कि आवश्यकता थी तब ही बाबा का सिधाश्रम प्रस्थान हो गया-------- मुझे बड़ी निराशा हो रही थी कि अब मेरे बच्चों कैसे मै ये चेतना प्रदान करूँ और सबसे बड़ी बात निखिलजी भी अपनी साधना हेतु बाहर गए हुए थे...... किन्तु तीसरे मंथ मे ही निखिलजी को आदेश हुआ कि घर वापिस जाओ और बच्चे को चेतना मंत्र प्रदान करो और तब निखिल जी ने एक विशिष्ट प्रक्रिया संपन्न की .
भाइयों-बहनों ये अति विशिष्ट क्रिया थी जिसे देखकर हैरान थी, और साथ ही मुझे चेतना सुननेपढ़ने हेतु दिया...... मैने पूरे नौ महीने तक ना केवल इन मन्त्रों पड़ा बल्कि और भी अलग-अलग साधनाएं संपन्न की क्योंकि मैने कुछ सदगुरुदेव से सुना था की स्त्री के गर्भधारण के पश्चात माँ का बच्चे से सीधा सम्बन्ध होता है और जो कुछ भी माँ सुनती पढ़ती या देखती है व सीखता जाता है.......
ये मन्त्र बच्चे को चैतन्य करने के साथ ही गर्भ को भी पूर्ण सुरक्षित रखते हुए बच्चे को भी सुरक्षित रखता है और ये देखा..... 
मेरा बेटा बॉबी पूरे ११वे माह के पहले सप्ताह मे हुआ, और पहले दिन से ही ये कुछ ज्यादा ही चैतन्य थाइसके क्रिया कलाप एक सामान्य बालक जैसे नहीं थे......सबसे बड़ी बात मेरे शरीर मे जहर बन गया था और डॉक्टर ने कह दिया था कि या तो बच्चा बचेगा या माँ .......किन्तु जब इसका जन्म हुआ तो ये पूर्ण स्वस्थ था......परन्तु मुझे बचाने के लिए गुरुदेव को आना पड़ा,जिसे मैंने बेहोश होते होते भी देख लिया था-----  
भाइयो-बहनों मै अकेली नहीं हूं जिसे गुरुदेवजी की कृपा प्राप्त हुई. मेरे साथ की कई बहनें हैं जिन्हें अलग-अलग अनुभव प्राप्त हुए हैं. मै अपने सारे अनुभव आप सबके साथ इसलिए बाँट रही हूँ क्योंकि आप सब मंत्रो का साधनाओं का और उनसे सम्बंधित क्रियाएँ, प्रतिबन्धननियम को समझ सको---------------- 
भाइयों-बहनों इस कैसेट पर सदगुरुदेव ने इसलिए प्रतिबन्ध लगाया था क्योंकि अक्सर गुरुदेव हम शिष्यों कि उन्नति हेतु, लाभ हेतु प्रकृतिस्थ होकर मन्त्रों को प्राप्त करते थेऔर हमे प्रदान करते थे------------ चूँकि कि मन्त्र स्वयं गुरु और गुरुदेव स्वयं मन्त्र बन जाते थे इसलिए गुरुदेव ने ऐसी अनेक दीक्षा और मन्त्रों पर प्रतिबन्ध लगाया हुआ था......
भाइयों बहनों मेरे दोनों पुत्र अत्यंत मेधावी हैं और इसका प्रमाण मुझे देने कि आवश्यकता नहीं है.......: सदगुरुदेवजी ने इस मन्त्र कि अनेक विशेषताएं बताई हैं, जिनमें प्रमुख है ------
यह मंत्र उच्चकोटि का संतान प्रदाता है,अलौकिक और अद्वितीय है, 
जिन स्त्रियों को गर्भ धारण करने मे समस्या हो वो भी इसका उच्चारण या श्रवण करें तो उचित लाभ प्राप्त हो जाता है ...
जिन कन्याओं के विवाह मे बाधा आ रही हो, यदि वे पूर्ण श्रद्धाभव से इसका उच्चारण करें तोस्वतः ही बध्दएं समाप्त होकर विवाह संपन्न हो जाता है.......
ये मंत्र जहां स्त्रियों और बालिकाओं के लिए फलदाई है वहीँ ये मन्त्र पुरुषों और बालकों के लिए भी पूर्ण लाभदायक है..... क्योंकिं इनके माध्यम से वे शिक्षा मे श्रेष्ठता और पूर्णता प्राप्त कर सकते हैं, इन मंत्रो के प्रभाव स्वरुप उनके चेहरे पर दिव्यता और तेजश्विता दिखाई देने लगती है इस तरह ये मन्त्र पुरुषों के लिएस्त्रियों के लिएबालिकाओं के लिएबालकों के लिए और वृद्धों के लिए भी बहुत ही उपयोगी हैक्योंकिं इसके माध्यम से ह्रदय के,जीवन के और शरीर के सभी तंतु चैतन्य हो जाते हैं. 
ऐंसे बुजुर्ग यदि मोक्ष कि इच्छा रखते हों, या प्रभु दर्शन के आकांक्षी हों तो उनकी ये इच्छा ये मन्त्र पूर्ण करते ही हैं..... भाइयों एक बार "गुरुवर ने बताया था कि इन मन्त्रों विश्वमन्त्र कहा गया है इन्हें "विश्वेत्मामं", "विश्वदेवात्मामं"और ब्रह्मंडात्मामं कहा गया है. 

भाइयों बहनों सदगुरुदेव ने कहा है ये मन्त्र अलौकिक हैं, अत्यंत गोपनीय है ,और उनके ही शब्दों मे "मैंने इन मंत्रो को अभी तक गोपनीय रखा है और सार्वजानिक रूप से प्रकट नहीं कियाक्योंकि अपात्र को दान देने से उस दान कि महिमा घट जाती है यदि एक सामान्य व्यक्ति को उच्चकोटि का हीरा दे दिया जाये तो वह उसका मूल्यउसकी महत्ता को समझ नहीं पाता ." 
अब मै उन मंत्रो को स्पष्ट कर रहा हूं जो प्रकृति निर्मित है , जिनकों ना देवताओं ने बनाया हैना यक्षों नेना गंधर्वों नेना किन्नरों नेना मनुष्यों ने,ना ऋषियों ने . ये स्वयंभू हैं ये जो अपने आप मे दिव्य और चेतनायुक्त हैं-------- 
भाइयों-बहनों गुरुदेव के इन शब्दों को समझ पायेगा ये मन्त्र उसको ही पूर्णता के साथ लाभ प्रदान करेंगे........ 
सदगुरुदेव ने एक जगह ये भी कहा है कि "मै इन मंत्रो का मूल ध्वनि मे उच्चारित कर रहा हूं क्योंकि मन्त्र के साथ ध्वनि अत्यंत आवश्यक और अनिवार्य तत्व है तथा इसका उच्चारण उसी ध्वनि मे किया जाये जिस ध्वनि के साथ प्रकृति ने निर्मित किया है." 
किन्तु अब इसकी आवश्यकता बहुत ज्यादा है क्योंकि जरुरी है अब नए मार्गदर्शन की, नई चेतना कीजो कि सदगुरुदेव के द्वारा प्रदत्त ज्ञान ही है जिसके माध्यम से हम सब मिलकर इस कार्य को आगे बढ़ाएंगे ------ है ना  
भाइयों बहनों जरा सोचिये यदि आज हम उस कैसेट को प्राप्त करना चाहें तो ---- किस गुरुधाम...... ? 
और क्या गारंटी है कि वो वही कैसेट है मूल ध्वनि वाली ?
और इसी कारण गुरुदेव ने शिविर मे इसका प्रयोग करवाया था .
प्रातः स्नान कर स्वक्छ वस्त्र पहन कर आसन पर बैठ जाएँ और गणपतिजी की पूर्ण पूजा संपन्न करें.
जो कि आप सब को पता ही है 
फिर गुरु पूजन करें और अनुमति एवं आशीर्वाद प्राप्त करें...... 
अब पूर्ण रूप गुरुदेव का ध्यान करते हुए----- क्योंकि मन्त्र, गुरु,श्रवणकर्त्ता या साधक या पाठक तीनो का एक दुसरे से पूर्ण सम्बन्ध स्थापित हो जाता है.
भाइयों-बहनों एक विशेस बात इस मन्त्र के पहले और बाद में "ध्यान धारणा और समाधि" बुक मे दिए हुए श्लोकों का नित्य पाठ करना हैक्योंकि तभी सदगुरुदेव निखिलेश्वरानन्द स्वरुप मे आकर आपको चेतना दीक्षा दे सकें और चेतना मन्त्रों के साथ समाविष्ट हो सकें....आपके शरीर मे प्राणों मेऔर सातों चक्रों मे.... 

वे मन्त्र इस प्रकार है ......

पूर्णां परेवां मदवं गुरुर्वे चैतन्यं रूपं धारं धरेशं
गुरुर्वे सनतां दीर्घ मदैव् तुल्यम् गुरूवै प्रणम्यम् गुरूवै प्रणम्यम् 
अचिन्त्य रूपं अविकल्प रूपं ब्रम्हा स्वरूपं विष्णु स्वरूपं 
रुद्रात्वेमेव परतं परब्रह्म रूपं गुरूवै प्रणम्यं गुरूवै प्रणम्यं 
हे आदिदेवं प्रभवं परेशां अविचिंत्य रूपं हृधयस्त रूपं
ब्रहमांड रूपं परमं प्रणितं प्रमेयं गुरूवै प्रणम्यं गुरूवै प्रणम्यं 
हृदयं त्वमेवं प्राणं त्वमेवं देवं त्वमेवं ज्ञानं त्वमेवं 
चैतन्य रूपं मपरं तहिदेव नित्यं गुरूवै प्रणम्यं गुरूवै प्रणम्यं अनादी अकल्पमयवां पूर्ण नित्यंअजन्मा अगोचर अदिर्वां अदेयम
अदेवांसरी पूर्ण मदैव् रूपं गुरुर्वे प्रणम्यं गुरुर्वे प्रणम्यं 

इन पांच श्लोकों के साथ ही इन विशिष्ट पांच श्लोकों का भी जप करना चाहिए, जिन के माध्यम से पूज्य "गुरुवर श्री निखिलेश्वरानंदजी" पूर्णरूप से गुरु रूप में आपके समक्ष स्पष्ट होते हुए आपको चेतना दीक्षा भी प्रदान करें,जिससे ये चेतना मन्त्र आपके शरीर मे स्थापित हो सकें......

आदोवदानं परमं सदेहं प्राण प्रमेयम परसंप्रभूतम 
पुरुशोत्मां पूर्ण मदैव रूपं निखिलेश्वरोयं प्रणमं नमामि 
अहिर्गोत रूपं सिद्धाश्रमोयं पूर्नास्व रूपं चैतन्य रूपं 
दिर्घो वतां पूर्ण मदैव नित्यं निखिलेश्वरोयं प्रणमं नमामि
ब्रह्माण्डमेवं ज्ञानोर्णवापं सिद्धाश्रमोयं सवितं सदेयं 
अजन्मं प्रवां पूर्ण मदैव चिनत्यं निखिलेश्वरोयं प्रणमं नमामि 
गुरुर्वै त्वमेवं प्राण त्वमेवं आत्म त्वमेवं श्रेष्ठ त्वमेवं 
आविर्भ्य पूर्ण मदैव रूपं निखिलेश्वरोयं प्रणमं नमामि 
प्रणम्यं प्रणम्यं प्रणम्यं परेशां प्रणम्यं प्रणम्यं प्रणम्यं विवेशां 
प्रणम्यं प्रणम्यं प्रणम्यं सुरेशां निखिलेश्वरोयं प्रणमं नमामि
 

अब मै उस साधना को स्पष्ट कर रही हूं जो मैंने कि है...

प्रातः ४ से ५ बजे के बीच उठ कर स्नान कर स्व्क्छ वस्त्र धारण कर आसन पर बैठ जाएँ और गुरु गणपति पूजन कर सम्बंधित श्लोकों का ५ बार पाठ करें तथा उसके बाद निम्न मन्त्र कि ११ माला स्फटिक माला से जाप करें तथा दुबारा फिर से ५ पाठ करें.......

पूर्वां परं पूर्णताम पूर्वेसां चैतन्य रूपम स: 
चैतन्यता पूर्वा आथारम्यानं श्रियं च सिद्धि: |
 

मन्त्र जप के बाद थोड़ी देर तक उसी आसन पर बैठ कर अपने मन मे भावना करें कि आपके अंदर चैतन्यता, दिव्यता समाहित हो रही है.....
भाइयों-बहनों दरअसल ये साधना गर्भवती स्त्रियों को तो पूरे नौ माह ही करना है किन्तु यदि पुरुष या बालक या कुमारी इस साधना को करते हैं तो ११ दिन कि साधना है......  और वाकई यदि इस साधना का पूर्ण लाभ लेना है तो इसे गंभीरता से ही करें और गंभीरता से ही लें ....... 
और अब तैयार हो जाएँ इस दिव्य और गोपनीय साधना की उर्जा तेजस्विता चेतना को ग्रहण करने के लिए......... 


सौजन्य से 
रजनी भाभी 





Sunday, 24 May 2015

स्वर्ण तंत्रम - स्वर्ण बनाने की दुर्लभ विधिया

स्वर्ण तंत्रम
Swarn Tantram
स्वर्ण बनाने की दुर्लभ विधिया

पारद विज्ञानं, पदार्थ विज्ञानं या स्वर्ण विज्ञानं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि हे. जिसे फ़ारसी में " कीमियागिरी " और अंग्रेजी में " गोल्डन गॉडेस " कहा गया हे. अर्थात भगवन के दर्शन करना या उन्हें प्राप्त करना जितना ही कठिन हे उतना ही स्वर्ण विज्ञानं को  सीखना या समझना कठिन है. इसलिए पुरे संसार के पारद विज्ञानी इस खोज में लगे है की वो पारद विज्ञानं को भली भाति समझ ले

मेने इस पुस्तक में इस कठिन और दुर्लभ ज्ञान को अत्यंत आसानी से समझने का प्रयास किया है. मेने ये अनुभव किया है की धीरे धीरे ये विद्या लुप्त होती जा रही है. इस पुस्तक को लिखने का विचार तब आया जब एक शिष्य मेरे पास आया उसका नया नया विवाह हुआ था परन्तु किसी वजह से शारीरिक रूप से बहुत ही कमजोर था. घर से तो वो आत्महत्या करने के लिए निकला था पर किसी तरह मेरे पास पहुंचा और अपनी व्यथा सुनाई और पूर्ण पुरुषत्व प्राप्त करने के लिए सहायता मांगी तो मेने बाजार से उसे शुद्ध पारद प्राप्त करने के लिए भेजा जो की " यौवन कर्तरी सिद्ध पारद " हो. जिसके सेवन से वह पूर्ण पुरुषत्व प्राप्त कर सके
परन्तु आश्चर्य की बात है की पुरे दिल्ली में कोई भी वेध या रसायनशाला नहीं मिली जिसमे इस तरह का संस्कारित पारद मिल सके. उस दिन मेरे मन को गहरी चोट लगी कि जो भारतवर्ष पारद विज्ञानं के क्षेत्र में सबसे आगे रहा है जिसके पास इस विज्ञानं को समझने के लिए हजारो ग्रन्थ और कई विश्वविधालय है वह इस प्रकार के पारद के संस्कार नहीं सिखाये जाते इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा
मेने उसी समय निश्चय कर लिया कि अगर समय मिला तो इस विषय में पूर्ण प्रमाणिकता के साथ लिखने का प्रयत्न करूँगा. .

पारद विज्ञानं वास्तव में एक ऐसा विषय है जिसे सिर्फ गुरु के चरणो में बैठ कर ही सीखा जा सकता है. अभी तक इस विषय पर जितने भी ग्रन्थ लिखे गए है वो या तो सभी संस्कृत  में लिखे गए है या फिर इतने दुरूह और कठिन है कि उनको समझना अत्यंत मुश्किल है
मेरे जीवन का बहुत बड़ा भाग जंगलो बीता है और मेने इसकी कठोरता को आत्मसात किया है. इस प्रकार के प्राचीन ज्ञान को प्राप्त करने के लिए समझने के लिए मेने कई वर्ष हिमालय कि कंदराओं बिताये इसलिए में पूर्ण प्रमाणिकता से कह सकता हु कि भारत के यह प्राचीन ज्ञान अद्वितीय है इसके द्वारा शुद्ध और निर्दोष स्वर्ण का निर्माण किया जा सकता है और कई पीढ़ियों कि दरिद्रता दूर कि जा सकती है.
इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस पुस्तक में जिस प्रकार के प्रयोग और परिक्षण दिए हुए है उसके माध्यम से आप घर बैठे इसमें पूर्णता प्राप्त कर सकते है पर अगर आप इस विषय को आत्मसात करना चाहते है तो ये सिर्फ गुरु चरणो में बैठ कर ही संभव है क्युकी यह विषय अनंत सागर कि तरह इहे जिसका कोई अंत नहीं है.

एक बार शंकराचार्य ने कहा था कि अगर मुझे दो या चार शिष्य ऐसे मिल जाये जो पूरी तरह समर्पित हो तो में पारद ज्ञान कि मदद से पुरे संसार कि दरिद्रता को समाप्त कर दूंगा, में भी उन्ही के शब्दों को दोहराता हुँ कि अगर सही मायनो में मुझे कुछ शिष्य मिल जाये जो कि हर परीक्षा कि कसोटी पर खरे उतरे तो में भारत कि नहीं पुरे विशव कि दरिद्रता समाप्त कर सकता हुँ क्युकी में इस ज्ञान को किताबो में नहीं बल्कि कुछ जीवित ग्रन्थ तैयार करना चाहता हूँ . 

भारत की प्राचीन रहस्य्मय विधयो में एक " कीमियागिरी " या " रसायन विद्या " प्रमुख विद्याओ में एक हे. इसका प्रचलन केवल भारत में ही नहीं बल्कि चीन अरब यूनान आदि देशो में था. देखा जाये तो आज परमाणु technology का जो विकास हुआ हे उसके मूल में यही रसायन विज्ञानं है
रसायन विज्ञानं में हलकी धातुओ से जैसे ताम्बा पारा सीसा, सोना या चांदी बनाने का ज्ञान ही नहीं बल्कि ऐसी औषधोया तैयार करना भी है जो की बुढ़ापे को योवन में और मृत्यु को अनत जीवन में बदलने का ज्ञान भी शामिल है. चिकित्सा विज्ञानं में प्राचीन काल से ही दो शब्दों पे बहुत जोर दिया गया है " देह सिद्धि "और लोह सिद्धि " यानि अमरत्व की प्राप्ति और जीवन में समृद्धि.

भारत के हर प्राचीन ग्रन्थ में इस विद्या का जिक्र है. अर्थववेद में इस विद्या के bare में विस्तार  से वर्णन गया है. उसमे बताया गया है की अगर पर को संखिया या नील थोथे से पुट देकर जारण किया जाये तो  निश्चय ही वह पारा लोहे को सोने में बदल देता है .
रसायन विद्या की उत्पत्ति भगवान शिव से मानी जाती है. जिन्हे वेदो में रूद्र का नाम दिया गया है. भगवान शिव ने इस विद्या के सम्बन्ध में कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए है जिनका विवरण विस्तार से " रुद्रयामल तंत्र " में प्राप्त होता है. इसके अनुसार पारद शिव वीर्य है और अपने आप में एक सजीव वस्तु है. यदि पारद में अरण्ड के बीजो का पुट देकर स्वर्णग्रास दिया जाये तो ye पारा निश्चित ही सोने में बदल जाता है. कई आचार्यो ने इस कथन पर प्रयोग भी किये और सफल हुए .

उन दिनों " अश्वनी कुमार " देवताओ के चिकित्सक थे और इस विद्या के पूर्ण जानकार थे. उन्होंने एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा जिसका नाम " धातु रत्न माला " है इसमें ताम्बे से स्वर्ण बनाने की विधिया बताई गयी है. 
अश्वनी कुमार ने पहली बार पारद के आठ संस्कारो की स्पष्ट विवेचना की. यदि ऐसे अष्ट संस्कारित पारे को किसी वृद्ध अशक्त या रोगी को दिया जाये तो यह पूर्ण काया कल्प करने की क्षमता रखता है. अश्वनी कुमार ने यह भी स्पष्ट किया है की यदि ताम्बे को पूर्ण रूप से पानी की तरह पिघला कर, इस अष्ट संस्कारित पारे का सम्पुट किया जाये तो उसी समय यह सोने में परिवर्तित हो जायेगा.
" धरणीधर संहिता " में पारद के बारे में प्रामाणिक रूप से बताते हुए कहा गया है -

य: श्लेषप्रनिलपित्तदोषशमनो रोगापहो मूर्छित: !
पंचत्व च गतो ददाति विपुलं राजयं चिरिंजीवितम् !!
वृद्धं खे गमन: करोत्यमरतां विद्याधरत्व नृणा !
सो य: पातु सूरासुरेन्द्रनमित: श्री सूतराज प्रभु !!
अर्थात पारे को यदि मूर्छित कर दिया जाये तो ऐसा पारा शरीर में वात पित्त एवं कफ को दूर करता है और यदि पारद का विशेष संस्कारो से मारण कर दिया जाये तो ऐसा पारद दीर्घायु देता हुआ अमरत्व प्रदान करता है और यदि पारद के आगे के संस्कार भी पुरे किये जाये तो यह आकाश गमन गुटिका देकर मनुष्य को आकाश में विचरण करने की सामर्थ्य प्रदान करता है. ऐसे मनुष्य को देवता भी प्रणाम करते है.

To be continue........


Monday, 29 December 2014

मनोकामना पूर्ति का एक सरल प्रयोग:

आपके और हमारे मन में हर समय कोई कोई मनोकामना जरुर होती है और मनोकामना पूर्ण होने पर हमें अत्यंत प्रसन्नता होती है।

हर मानव मन चाहता है की उसकी मनोकामना पूर्ण हो, कोई चमत्कार हो जाए जिससे उसकी कामना पूर्ण हो जाये; कुछ लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण भी हो जाती हैं लेकिन हर व्यक्ति के साथ चमत्कार नहीं हो सकता।


लेकिन तंत्र में कई गुप्त क्रियाएं, मंत्र, साधनायें और विधान हैं जिनकी सहायता से आप अपनी मनोकामना पूर्ण कर सकते हैं, और हर व्यक्ति अपने जीवन में चमत्कार जैसे शब्दों का प्रयोग कर सकता है।


तो आपके जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन लाने के लिए एक ऐसी ही साधना जिसे आप पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ करें और लाभ उठाएं।

आप एक नारियल लेकर (जो की जटा से युक्त हो) उसे सिंदूर मे तिल का तेल मिलकर और गीला कर उस से पूरा रंग दें और अपने मन की कामना पूरी होने की प्रार्थना माँ भगवती जगदम्बा से करें और निम्न मंत्र का १५ मिनट तक उतनी ही जोर से उच्चारण करें,जितने मे आपको ही सुनाई दे.किसी और को नहीं.
ईं ह्रीं कं ह्रीं ईं (OM EEM HREEM KAM HREEM EEM OM)


  ये क्रम आपको दिन तक करना है.याद रहे नारियल सिर्फ पहले दिन ही स्थापित करना है.अंतिम दिन क्रिया पूरी होने के बाद नारियल को किसी नदी या तालाब मे विसर्जित कर दें और किसी बच्ची को जो घर से सम्बंधित ना हो,उसे कुछ मिठाई और धन दे दें.ये क्रिया असाध्य कामना भी सहज सिद्ध कर देती है आवशयकता है मात्र पूर्ण विश्वास की.

 प्रयोग करें और अपने अनुभव बताएं...



जय गुरुदेव।।

Thursday, 11 December 2014

अशुभ स्वप्न फल नाशक प्रयोग ....

 
 
 
 
स्वप्न   तो हर व्यक्ति  को आते ही  हैं , और  हर व्यक्ति  स्वप्न देखना  चाहता  हैं .जो शुभ कारी हो...सुंदरता युक्त  हो …पर  यह  आज तो भली भांति जाना  पहचाना   तथ्य हैं की  मानव  मन   के  दो भाग   होते  हैं ..एक तो चेतन और  एक अवचेतन .....चेतन  जिसमे  जो लगातार दिन प्रतिदिन  हम  सीखते  जाते हैं वह  समाते  जाता  हैं ..पर यह सब  हमारी   विचार .... हमारे  संस्कार ..हमारी सोच  के अनुसार ..या पर निर्भर  करता  हैं पर  अब्चेतन मन मे  तो    कितने  जीवनों की  अनंत  सुचनाये   से  युक्त    हैं और यह स्वपन ........   यह सब तो अबचेतन  मन का ही   तो  कमाल हैं, जो  की वास्तव मे अनंत  सूचनाओ  का भण्डार  हैं , वह जैसे ही चेतन मन शांत हुआ यह  अपना खेल प्रारंभ कर देता  है  तो कभी   भूत काल सबंधित   तो ......कभी  भविष्य काल के ..पर  स्वप्न किस काल सबन्धित हैं   यह जानना   इतना  भी आसान  नही ... 
पर   कुछ स्वपन   की बाते   सामान्य दैनिक जीवन ........ तो कुछ की अलौकिक   जगत से सबंधित   होती  हैं . पर  यदि  सुबह  सुबह     कुछ ऐसा  दिख जाए     जो  हमारे  लिए  भय कारक  हो ..भले  ही   वह वास्तविकता   न हो .पर हमारा  मन   पूरे  दिन   भर परेशां रहता  हैं . की कही  कुछ  ऐसा न   हो जाए .
अगर   जितना मानव उपलब्धिया  प्राप्त  करते  जाता हैं  उतना ही  वह  भय  का भी अपने लिए  सृजन करते  जाता  हैं .और यह  बहुत सामान्य  सा  तथ्य   हैं  पर ..अपने  ही किसी प्रिय जन के बारे   मे कोई  अशुभता  स्वपन मे  दिख रही  हो तो वह मन   और भी परेशां  होने लगता  हैं .


इस यन्त्र  का निर्माण  किसी भी शुभ  दिन  कर सकते  हैं . सिर्फ अष्ट गंघ   का प्रयोग   इसके निर्माण के लिए  स्याही के  रूप मे  करना  हैं साथ ही साथ .. यंत्र लेखन के लिए  अनार की लकड़ी का  प्रयोग किया  जाना  चहिये ..

जब यह  यन्त्र का निर्माण हो  जाए   तब किसी भी  धातु के  ताबीज के अंदर   इसको  रख कर उस  ताबीज  को  अपने  गले   मे धारण  कर ले . निश्चय  ही   इन  बुरे   और भयानक  स्वप्न   से आपको    रा हत मिलेगी ही .........हाँ यह  तो आपको पता  हैं की    जब भी यंत्र का  निर्माण किया  जाये  उसकी धूप  दीप से पूजा ...........  मतलब   सबसे पहले  आप बिना कटा  फटा  भोज पत्र  ले ले ..और  सारी  आवश्यक क्रियाये  जैसे सदगुरुदेव  पूजन    और अन्य    चीजे  कर ले .  फिर  पूर्ण प्रसन्नता  से भोज पत्र   पर इस  यंत्र  का  अंकन   या लेखन कर ले .और   धूप से   पूजा  भी .और् सदगुरुदेव जी  से  अपने कार्य की सफलता  के लिए   प्रार्थना   तो सर्वोपरि   हैं .



Jai Gurudev